ओशो को जन साधारण तक पहुँचाने का कार्य

यह बात वर्ष 1987-1988 के दिनों की है जब आश्रम में नीरज जैसे लोकप्रिय कवियों और कल्याण जी भाई जैसे संगीतकारों, तथा अन्य कलाकारों  का आना जाना शुरू हुआ और आश्रम में बुद्धा सभागार में उनके कार्यक्रमों के दौरान “फ्रेंड्स ऑफ़ ओशो” बैनर भी लगना शुरू हुआ. ओशो इनमें से कुछ को निजी तौर पर अलग से मिले, उनके साथ फोटो  सेशन भी हुए. ऐसे एक फोटो सेशन के दौरान ओशो ने कवि नीरज और उनके साथियों को कहा: “मुझे जन साधारण तक पहुँचाने का कार्य करो.” “Take Me To the Masses.”  
अभिप्राय यह था कि जनसामान्य कवियों के काव्य के माध्यम से, साथ ही उनके द्वारा ओशो के ज़िक्र से, ओशो और उनके बीच में एक सेतु निर्मित होगा। ओशो को यह ज़रूरी लगा कि जन सामान्य तक उन्हें पहुँचाया जाए, क्योंकि जनसामान्य कोई बुद्धिजीवी वर्ग नहीं होता, बौद्धिक ऊहापोह से ग्रसित नहीं होता–वह हृदयजीवी होता है, दिन भर कार्य में व्यस्त रहता है, अपने परिवार के पालन पोषण में संलग्न रहता है, और समय मिले तो सुबह शाम कुछ प्रार्थना-पूजा कर लेता है, कभी सिनेमा हो आता है, कुछ गीत गा  लेता है, भजन कीर्तन का मजा ले लेता है. वह ज़मीन की माटी से जुड़ा रहता है. उसे आकाश की ऊँची बातों में कोई रस नहीं होता।
कबीर जैसे संत कवि  ऐसे ही लोगों के बीच अपने गीत गाते रहे और उन्हें अपने मीठे और तीखे गीतों से उन्हें जगाते रहे. मीरा इन्ही लोगों के बीच अपनी सामाजिक लाज को छोड़ कर नृत्य करती और उन्हें कृष्ण के साथ जोड़ डेती थी. इन सामान्य लोगों ने न मीरा को ज़हर दिया और न कबीर को सताया कभी. इन लोगों ने जीसस को सूली नहीं दी और न सुकरात को ज़हर दिया, न मंसूर के हाथपांव काटे  –सूली देने वाले, ज़हर पिलाने वाले सब विशिष्ट लोग ही थे. अमेरिका में ओशो को ज़हर देने वाले भी समाज के ऊँचे दर्जे के ही लोग थे.
ओशो पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे अमीरों के गुरु हैं, और मैं जानता हूँ कि ओशो ने कभी भी जनसामान्य की उपेक्षा नहीं की, बल्कि उनका विशेष ख्याल रखा. प्रारम्भ में ओशो की पाक्षिक पत्रिका जो पुणे से छपती थी, उसके 24 अंकों का वार्षिक शुल्क 24 रुपैया कई वर्षों तक बना रहा, हमने कभी शुल्क बढ़ाने की बात कही तो ओशो ने मना कर दिया। 1986 के बाद रजनीश टाइम्स का मूल्य तीन से पांच रुपैया ही रहा. जब तक ओशो शरीर में रहे, उन्होंने अपनी पत्रिकाओं का दाम बहुत ही कम रखने पर ज़ोर दिया, ताकि जनसामान्य को भारी न लगे और अपनी पुस्तकों को लागत मूल्य –पेपर और प्रिंटिंग की लागत–इससे अधिक नहीं। आश्रम में ध्यान  प्रवचन आदि के लिए  प्रवेश शुल्क –राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय आगंतुक के लिए, 1974 में पांच रुपैये से शुरू होकर 1990 तक केवल 20 रुपैये तक पहुंचा। और इसके साथ साथ यह भी सुविधा भी बनी  रही कि जो व्यक्ति इतना भी शुल्क देने में असमर्थ है, उसको रियायत मिल जाती थी, काम्प्लीमेंटरी प्रवेश मिल जाता था.No hard and fast rule. 
ओशो को भलीभांति पता था कि जनसामान्य तक बात पहुंचना ज़रूरी है, इसलिए उन्होंने जे. कृष्णमूर्ति वाला एकांगी ढंग नहीं अपनाया कि वे केवल बौद्धिक लोगों के बीच बोलें। उन्होंने बड़े-बड़े खुले मैदानों में अपने प्रवचन दिए. समाजवाद से सावधान, सम्भोग से समाधि  की ओर, गांधी समीक्षा, भारत के जलते प्रश्न, नए समाज की खोज, गीता-दर्शन  ऐसे सैकड़ों प्रवचन खुले मैदानों में हुए. पॉकेट बुक्स के माध्यम से –शुरू शुरू में उनकी कीमत भी एक रुपिया या 2 -3 रुपैये होती थी और प्रत्येक रैलवे स्टाल पर ये पुस्तकें मिलती थी–ये सब आयोजन सामान्य व्यक्ति के लिए ही थे.
फिर उनके प्रवचन भारत के संतों, ऋषियों–जैसे कबीर, गोरख, नानक, रैदास, मीरा, पलटू, दादू, मलूक, नारद, शांडिल्य, दरियादास, जगजीवन, सहजो, दया, लिस्ट बहुत लम्बी है–पर हुए उनके प्रवचनों के  साथ भारत के विभिन वर्गों के सामान्य जन ओशो से जुड़ सके. ओशो के अष्टावक्र,  बुद्ध,  ताओ, सूफी, तंत्र, पतंजलियोग तथा  ज़ेन प्रवचन भी साथ-साथ चलते रहे. ओशो ने सभी को अपने साथ सभी को समाहित कर लिया। ओशो ने अपने शिविरों में अपनी उपस्थिति में ही कीर्तन ध्यान को भी समय दिया तथा मुंबई में ताओ और महावीर वाणी पर हुए प्रवचनों के साथ कीर्तन को भी जोड़ दिया। 1971 से 1975 –चार पांच वर्ष तक ओशो की कीर्तन मंडली देश भर में घूमती रही और गलियों और बाज़ारों में कीर्तन हुए. क्या यह उनका प्रयास सामान्य जान से जुड़ने का नहीं था?
लेकिन आज उनके आश्रम प्रबंधक कह रहे हैं कि “ओशो का यह स्थान केवल ज़ेन है, बाकी सबको भूल जाओ. ध्यान हो, लेकिन भक्ति की कोई बात मत करे।”  उनको सामान्य जन से बहुत डर लगने लगा है कि कहीं वे यहाँ अधिक संख्या में आकर इसे मंदिर न बना दें, बहुत दहशत है भाई, उन्हें सामान्य जन से कि अगर वे आ गए तो हमारी प्राइवेट क्लब लाइफ का क्या होगा! और उनका ज़ेन भी बहुत कमज़ोर और मुर्दा है, हमेशा डरा डरा है. उनको लगता है कि हिंदी प्रवचन ज्यादा बिके तो बहुत भारतीय लोग आ जायेंगे–विशेषकर बिहार वाले–क्योंकि वे ज्यादा मात्रा में ओशो के प्रवचनों को पढ़ते सुनते हैं।  दूसरा उपाय उन्होंने बहुत वर्षों से कर दिया है कि प्रवेश शुल्क को निरंतर अधिक से अधिक करते जाओ ताकि इस ढंग से उनके आने में रुकावट हो. 
यह कैसी विडंबना है कि ओशो का यह  मुख्य स्थान भारत भूमि पर है, ट्रस्टी भी सभी भारतीय हैं, लेकिन फिर भी कोई ट्रस्टी ऐसा निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं रखता जो यहां के वासियों के अनुकूल हो –सभी निर्णय जूरिख से या किसी और देश के रिमोट कण्ट्रोल से होते हैं. यहां बैठे ट्रस्टियों से पूछो तो उनका एक ही उत्तर होता है: This matter is Sub-Judice. उनकी ज़बान भी बंद कर दी गयी है. कितनी दयनीय स्थिति है यह ! और अंत में ओशो के इन वचनों का स्मरण करें : 
“जो मैं कह रहा हूं, अगर वह सच है और जो मैं कर रहा हूं, अगर वह अस्तित्व के अनुकूल है, जो मैं बोल रहा हूं, वह सनातन धर्म है तो सारे षड़यंत्र, सारी साजिशें मिट्टी में मिल जायेंगी, उनकी कोई कीमत नहीं है। इसलिए मैं उनके खंडन करने का और व्यर्थ अपना समय नष्ट करने की चेष्टा भी नहीं करता हूं। वे अपनी मौत मर जाने वाले झूठ हैं।  मैं तो उसका गुरु हूं जिसका हृदय प्रेम का धनी है। मैं तो उसका गुरु हूं जिसके प्राणों में ध्यान का धन है। मैं तो उसका गुरु हूं, जिसके भीतर सत्य को, सत्य के धन को खोजने की प्यास जगी है। अगर धनियों का गुरु ही कहना है तो निश्चित ही मैं धनियों का गुरु हूं, लेकिन तब मेरे धन की परिभाषा तुम्हें समझ लेनी होगी। जिनके पास केवल सोने और चांदी के ठीकरे हैं, उनको मैं भिखमंगे कहता हूं। धनी तो वह है, जिसके हृदय में शांति  है, आनंद है, उल्लास है, जिसके पैरों में नृत्य है, जिसकी श्वासों में बांसुरी है। जिसके भीतर परमात्मा ने थोड़ी सी झलक दिखा दी है। बस वही केवल धनी है और सब गरीब हैं।”
 स्वामी चैतन्य कीर्ति  

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